
Saurabh
बिल्कुल, मैं भी आचार्य जी की वज़ह से बाहरी जीवन को देख रहा हूॅं, अपने अन्तर्जगत को अच्छे से देख पा रहा हूॅं और बंधनों को छोड़ पा रहा हूॅं।
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बिल्कुल, मैं भी आचार्य जी की वज़ह से बाहरी जीवन को देख रहा हूॅं, अपने अन्तर्जगत को अच्छे से देख पा रहा हूॅं और बंधनों को छोड़ पा रहा हूॅं।
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