
✍🏻 पोस्ट 1 | 03 अक्टूबर'26 💭 विषय — इंडियन करेंट अफेयर्स ────────── 🟤 एक तम्बाकू की लत… और उसके पीछे छिपी बहुत बड़ी कीमत। हमारे आसपास तंबाकू चबाना इतना आम है कि उसका खतरा दिखाई ही नहीं देता। लेकिन एक नई वैश्विक स्वास्थ्य-अध्ययन इसकी बड़ी तस्वीर सामने रखता है। 📊 The Lancet Global Health में प्रकाशित Global Burden of Disease Study 2023 के अनुसार, 2023 में दुनिया में करीब 24.1 करोड़ लोग चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल कर रहे थे। 🌏 उसी साल इससे जुड़ी करीब 2.51 लाख मौतें हुईं। इनमें लगभग 84% मौतें दक्षिण एशिया में हुईं, यानी करीब 2.10 लाख मौतें। दक्षिण एशिया में 15 वर्ष से ऊपर की आबादी के करीब 14.6% लोग चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल करते थे। 🇮🇳 भारत इस तस्वीर का एक बड़ा हिस्सा है। पुरुषों में तंबाकू चबाने से जुड़ी मौत और बीमारी का 90% से ज्यादा कुल भार 10 देशों में केंद्रित था। भारत भी इनमें शामिल था है। महिलाओं में भी 90% से ज्यादा भार 10 देशों में था। ⚠️ असर सिर्फ कैंसर तक सीमित नहीं है। अध्ययन में स्ट्रोक और होंठ व मुँह के कैंसर तंबाकू चबाने से जुड़े स्वास्थ्य-हानि के प्रमुख कारणों में शामिल थे। 1990 से 2023 के बीच इसका कुल स्वास्थ्य-भार 116% बढ़ा। 2023 में करीब 64.8 लाख स्वस्थ जीवन-वर्ष बीमारी और समय से पहले मृत्यु के कारण खोए गए। 💰 बीमारी की कीमत सिर्फ शरीर नहीं चुकाता। भारत के 2017–18 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में पाया गया कि कैंसर से प्रभावित 75% से अधिक परिवारों को इलाज के कारण बहुत बड़ा स्वास्थ्य-खर्च उठाना पड़ा। करीब 44% परिवारों ने इलाज के खर्च के लिए उधार लिया या अपनी संपत्ति बेची। ⚖️ भारत में तंबाकू की बिक्री पर पूरी तरह रोक नहीं है, लेकिन 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों को बिक्री, शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर बिक्री और तंबाकू के विज्ञापन पर रोक है। खाद्य पदार्थों में तंबाकू या निकोटिन मिलाना भी प्रतिबंधित है। फिर भी नशा बना हुआ है। 🧠 यहीं से बात थोड़ी भीतर जाती है। नशा केवल पदार्थ की समस्या नहीं है। उसके पीछे अक्सर उस सामान्य जीवन-स्थिति से बचने की इच्छा होती है, जिसमें व्यक्ति (अहंकार) बेचैनी, अधूरापन या लगातार उत्तेजना खोजता रहता है। अगर वही सामान्य जीवन सचमुच पर्याप्त और सार्थक लगता, तो उससे कुछ समय के लिए भागने की जरूरत क्यों पड़ती? इसीलिए “नशा” केवल तंबाकू, शराब या ड्रग्स तक सीमित नहीं रह जाता। पैसा, प्रतिष्ठा, लगातार मनोरंजन, सोशल मीडिया या उपलब्धियों की दौड़ भी ऐसे विषय बन सकते हैं जिनमें व्यक्ति अपनी बेचैनी से बचने के लिए जीवन में जोड़ लेता है। अहंकार सुख चाहता है, लेकिन उस सुख की कीमत को छोटा करके देखता है। “बस एक पुड़िया” इसी छोटी-सी छूट का नाम है। ❓ जब किसी आदत का सुख और उसकी पूरी कीमत दोनों साफ़ दिखाई देने लगें, तो क्या फिर भी हम उसे “बस एक छोटी-सी जरूरत” कह पाएँगे? 🔎 क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसी आदत है, जिसकी कीमत दिखाई देने के बाद भी आप उसे पकड़े हुए हैं? 📚 स्त्रोत: The Lancet Global Health - Global Burden of Disease Study 2023 https://www.thehindu.com/sci-tech/health/worlds-90-health-burden-of-chewing-tobacco-concentrated-in-10-countries-including-india-study/article71533281.ece National Tobacco Control Program https://dghs.mohfw.gov.in/national-tobacco-control-programme-hindi.php















































