
मैंने अपने जीवन में लगभग 1995 से तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन शुरू किया था। उस समय मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था। धीरे-धीरे यह मेरी आदत बनती चली गई। उस समय शायद मुझे यह समझ भी नहीं थी कि मैं अपने शरीर और मन के साथ क्या कर रहा हूँ। कई वर्षों तक मैं इस आदत में उलझा रहा। कभी यह नहीं सोचा कि आखिर मुझे नशे की आवश्यकता क्यों पड़ती है? मैं अपने भीतर ऐसी कौन-सी परिस्थिति या बेचैनी महसूस करता था, जिससे बचने के लिए नशे का सहारा लेता था? जब मैं आचार्य जी के विचारों और संगठन से जुड़ा, तब धीरे-धीरे अपने जीवन को देखने और समझने का अवसर मिला। उनकी शिक्षाओं के माध्यम से अपने आचरण, आदतों और मान्यताओं पर प्रश्न उठाने लगा। आज मैं पूरी तरह से नशे से दूर हूँ। मेरे पास किसी भी प्रकार का नशा नहीं है और मैं उसका सेवन भी नहीं करता हूँ। लेकिन इस अनुभव ने मेरे सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है। क्या केवल नशा छोड़ देना ही पर्याप्त है? या मुझे उस मानसिकता को भी समझना होगा, जिसने इतने वर्षों तक मुझे नशे का गुलाम बनाए रखा? मैंने महसूस किया कि नशा केवल किसी पदार्थ का सेवन नहीं है, बल्कि कई बार यह अपने भीतर की बेचैनी, खालीपन और असंतोष से भागने का एक माध्यम भी बन जाता है। अब मेरा प्रयास केवल नशे से दूर रहने का नहीं, बल्कि अपने मन को समझने का भी है। मैं यह देखना चाहता हूँ कि कहीं मैं किसी दूसरी आदत, आकर्षण या मान्यता का गुलाम तो नहीं बन रहा हूँ। मेरे लिए इस यात्रा का वास्तविक अर्थ यही है कि जीवन को बेहोशी में नहीं, बल्कि समझदारी और जागरूकता के साथ जिया जाए।



















