
अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 पढ़ते समय मुझे महसूस हुआ कि गहरे आध्यात्मिक विषय भी सही तरीके से समझाए जाएँ तो बहुत स्पष्ट हो सकते हैं। इस पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने अष्टावक्र गीता के शुरुआती प्रकरणों को बेहद सरल और जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया है। किताब की खास बात यह है कि यह केवल श्लोकों की व्याख्या नहीं करती, बल्कि उनके पीछे छिपे अर्थ को हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जोड़ती है। “मैं कौन हूँ” और ...

श्लोक १ & २ जनक _ज्ञान कैसे प्राप्त करें, मुक्त कैसे हो ? अष्टावक्र _ यदि मुक्ति चाहते हो तो विषयों को विश की तरह त्याग दो l क्षमा , सरलता, दया, संतोष एवं सत्य का अमृत के समान सेवन करो l दुःख का कारण क्या है _ संसार को भोग की दृष्टि से देखने वाला अहंकार ही दुख का मूल कारण है दुखिया सब संसार है, खावे और सौवें दुखिया दास कबीर है, जागे और सौवें क्षमा _ जब आपका भीतरी अहित ही न हो, और ये तभी स...

पुस्तक बहुत ही अच्छी है। पेज क्वालिटी भी बहुत अच्छी है। अगर यह बुक प्रशांत अद्वैत संस्था के अलावा कोई और पब्लिशर पब्लिश करता तो कम से कम ₹300 की मिलती। वही संस्था हमें इतनी कम कीमत मे इस पुस्तक को उपलब्ध करा रही है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। 🏅वही पुस्तक के भीतर का ज्ञान बहुमूल्य है जो आपको और कहीं नहीं मिल सकता।

Rishi Ashtavakra's simple and brute honest explanations really helped me to understand what is this world , who am I really.. ,Why I'm so much attracted to the worldly things.., why there is always a restlessness inside me..! Definitely benefitted from this book!! At last the quality of the book is truly great..loved it!