


वारि जाऊँ मैं सतगुरु के किया मेरा भरम सब दूर! ये भजन हमेशा से मेरा बहुत प्रिय रहा है क्यूँकि इस भजन में मैं अपने और आचार्य जी के बीच का रिश्ता देखती हूँ। इस book ने मुझे मेरे वास्तविक सतगुरु से मिलाया है, और सबसे अच्छी बात है कि इस किताब को कहीं भी ले जा सकते हैं छोटी और बहुत प्यारी है।✨❤️

इस पुस्तक ने मुझे समझाया कि सच्चा समर्पण भावुकता से नहीं, बल्कि भ्रमों के टूटने से जन्म लेता है। आचार्य प्रशांत जी की व्याख्या कबीर साहब की वाणी को अत्यंत स्पष्ट और जीवंत बना देती है। गुरु कौन है और उसकी पहचान क्या है, इस पर पुस्तक गहरी दृष्टि देती है। पढ़ते हुए कई पुरानी धारणाएँ प्रश्नों के घेरे में आ गईं। छोटी पुस्तक है, लेकिन प्रभाव बहुत गहरा छोड़ती है।

वारी जाऊं मैं सतगुरु के” एक बेहद गहरी और भावनात्मक पुस्तक है, जो संत कबीर के भजनों के माध्यम से सच्चे गुरु और भक्ति के अर्थ को समझाती है। यह सिर्फ भक्ति की बात नहीं करती, बल्कि भक्ति के पीछे छिपे सत्य को उजागर करती है। इस किताब को पढ़ते हुए मुझे सबसे ज्यादा यह समझ आया कि गुरु का मतलब किसी व्यक्ति की पूजा करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को समझना है जो हमें सच्चाई की ओर ले जाता है। यह दृष्टिकोण बहुत अलग औ...

एक तरफ तो भारत ने आध्यात्म का उच्चतम शिखर ‘अद्वैत वेदांत’ देखा है और दूसरी तरफ पतन, अंधविश्वास और भ्रम का रसातल भी; तो ऐसे में एक मौलिक प्रश्न उठता है कि- उच्चतम दर्शन के प्रताप के बावजूद भी आज धर्म की इतनी दुर्दशा कैसे? वस्तुत: आध्यात्म का सरोकार होता है– व्यक्ति के दुख से, ना कि किसी परलोक में विराजमान भगवान से। हमारा प्रत्येक कर्म इसी दुख की अभिव्यक्ति होता है, यूं कहें तो दिन भर में कि...

एक तरफ तो भारत ने आध्यात्म का उच्चतम शिखर ‘अद्वैत वेदांत’ देखा है और दूसरी तरफ पतन, अंधविश्वास और भ्रम का रसातल भी; तो ऐसे में एक मौलिक प्रश्न उठता है कि- उच्चतम दर्शन के प्रताप के बावजूद भी आज धर्म की इतनी दुर्दशा कैसे? वस्तुत: आध्यात्म का सरोकार होता है– व्यक्ति के दुख से, ना कि किसी परलोक में विराजमान भगवान से। हमारा प्रत्येक कर्म इसी दुख की अभिव्यक्ति होता है, यूं कहें तो दिन भर में कि...