
इस पुस्तक ने मुझे समझाया कि सच्चा समर्पण भावुकता से नहीं, बल्कि भ्रमों के टूटने से जन्म लेता है। आचार्य प्रशांत जी की व्याख्या कबीर साहब की वाणी को अत्यंत स्पष्ट और जीवंत बना देती है। गुरु कौन है और उसकी पहचान क्या है, इस पर पुस्तक गहरी दृष्टि देती है। पढ़ते हुए कई पुरानी धारणाएँ प्रश्नों के घेरे में आ गईं। छोटी पुस्तक है, लेकिन प्रभाव बहुत गहरा छोड़ती है।