
अकसर बातों बातों में हर बार यही कहती हूं कि मन ऐसा कर रहा है, मन नहीं है, बचपन से यही भाषा इस्तेमाल की है, पर आचार्य जी को पढ़कर सुनकर पता चल रहा है कि, जिस शरीर और मन को दोषी दोहराकर और मोहरा बनाकर मैं खुदको छिपाती हूं, वो कितना असंगत है और अन्यान्य है । जिसका कोई दोष नहीं उसपर दोष, मन किताब खुदको खुदके बारे में बताती है, की जहां अड़चन लगती है वहां नहीं है, कहीं और है, और उसी नस पर बार बार लाती ...

इस किताब “मन” को पढ़कर मुझे पहली बार एहसास हुआ कि हम अपने मन को कितना गलत तरीके से देखते हैं। पहले मैं सोचता था कि मन को शांत करना या नियंत्रित करना ही समाधान है, लेकिन इस किताब ने बताया कि असली बात उसे समझने की है। लेखक ने बहुत सरल भाषा में समझाया है कि मन कोई ठोस चीज़ नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं का एक लगातार बदलता हुआ प्रवाह है। यह समझ मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि इससे मैंने अपने विच...

"छः-आठ बरस पहले किसी ने मुझसे पूछा था, ‘व्हाट लाइज़ बियोंड माइंड?’ (मन के परे क्या है?) मैंने कहा, ’मोर माइंड (अधिक मन)।‘" "व्यक्ति नहीं त्यागना होता है, व्यक्ति से सम्बन्धित अपना स्वार्थ त्यागना होता है।" "नोइंग मस्ट बी ऑथेंटिकेटिड बाय बीइंग। (जानने को होने के द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।) अगर बीइंग नहीं हुई है, तो नोइंग (जानने) का दम्भ मत भरो। इसलिए अभ्यास चाहिए।" और ऐसे न जाने सैकड़ों व...