![मन | Mann [National Bestseller]](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-0ef53ffa-07f0-4a99-82c4-502b511a27b6/30/image.jpg)
बन्धन भी, मुक्ति भी

अकसर बातों बातों में हर बार यही कहती हूं कि मन ऐसा कर रहा है, मन नहीं है, बचपन से यही भाषा इस्तेमाल की है, पर आचार्य जी को पढ़कर सुनकर पता चल रहा है कि, जिस शरीर और मन को दोषी दोहराकर और मोहरा बनाकर मैं खुदको छिपाती हूं, वो कितना असंगत है और अन्यान्य है । जिसका कोई दोष नहीं उसपर दोष, मन किताब खुदको खुदके बारे में बताती है, की जहां अड़चन लगती है वहां नहीं है, कहीं और है, और उसी नस पर बार बार लाती ...

इस किताब “मन” को पढ़कर मुझे पहली बार एहसास हुआ कि हम अपने मन को कितना गलत तरीके से देखते हैं। पहले मैं सोचता था कि मन को शांत करना या नियंत्रित करना ही समाधान है, लेकिन इस किताब ने बताया कि असली बात उसे समझने की है। लेखक ने बहुत सरल भाषा में समझाया है कि मन कोई ठोस चीज़ नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं का एक लगातार बदलता हुआ प्रवाह है। यह समझ मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि इससे मैंने अपने विच...