
अकसर बातों बातों में हर बार यही कहती हूं कि मन ऐसा कर रहा है, मन नहीं है, बचपन से यही भाषा इस्तेमाल की है, पर आचार्य जी को पढ़कर सुनकर पता चल रहा है कि, जिस शरीर और मन को दोषी दोहराकर और मोहरा बनाकर मैं खुदको छिपाती हूं, वो कितना असंगत है और अन्यान्य है । जिसका कोई दोष नहीं उसपर दोष, मन किताब खुदको खुदके बारे में बताती है, की जहां अड़चन लगती है वहां नहीं है, कहीं और है, और उसी नस पर बार बार लाती ...

उमा जी, यह पकड़ बहुत साफ है। इतने सालों से जिसे 'मन कर रहा है' कहकर टाला, उसी को अब मोहरा कहकर पहचान लिया, यह छोटी बात नहीं है। जो भाषा जन्म से इस्तेमाल हुई, उसकी जड़ तक पहुंचना और उसे गलत ठहरा पाना, यही असली देखना है। और आखिरी बात तो जैसे पूरी बात को सील कर देती है, आईना सामने है, देखना अपने हाथ में है।