
इस किताब को पढ़ने के बाद मुझे ये तो समझ आ गया कि मेरा मन कुछ भी कैसे करता है

रवि जी, आपने लिखा कि मन कुछ भी कैसे करता है ये समझ आ गया। ये समझना जहाँ खड़ा करता है वहाँ से अगला कदम देखने का काम बचता है, किताब पढ़कर मन के खेल को पहचान लेना एक बात है, और अपने उसी मन को आज किसी एक जगह पकड़ते हुए देखना बिलकुल दूसरी बात। समझ अभी सिर में है, जाँच अभी बाकी है। आचार्य जी के सत्रों में यही जाँचने का मौका मिलता है, वहाँ ज़रूर जाइए।