Acharya Prashant (AP) Books | भूले मन समुझ के लाद लदनिया | Bhoole Mann Samujh Ke Laad Ladaniya [New Release]
भूले मन समुझ के लाद लदनिया | Bhoole Mann Samujh Ke Laad Ladaniya [New Release]
संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
HindiLanguage
90Print Length
Description
प्रस्तुत पुस्तक कबीर साहब के भजन “भूले मन समुझ के लाद लदनिया” पर आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या है। पुस्तक में वे स्पष्ट करते हैं कि जीवन की समस्या कमी नहीं; समस्या यह है कि हमने अपने ऊपर बहुत कुछ ऐसा लाद लिया है जिसे हम सहारा समझते हैं—हमारे संबंध, सपने, उपलब्धियाँ, भविष्य की योजनाएँ, और यहाँ तक कि रत्न-पत्थर, ध्यान की विधियाँ, हीलिंग और रिट्रीट जैसे ऊपरी उपाय। इस सबमें अक्सर बोझ उतारने निकला मन और ज़्यादा बोझ लेकर लौटता है।
यह पुस्तक कोई नई विधि या उपाय नहीं देती; यह आंतरिक स्पष्टता की ओर ले जाती है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि संसार से संबंध रखना ही होगा। पर प्रश्न है: क्या वह संबंध आपको हल्का कर रहा है या और भारी? क्या वह आपकी पुरानी गाँठ खोल रहा है या एक नई गाँठ बाँध रहा है? क्या वह आपको स्पष्टता दे रहा है या बस एक और आदत, एक और आसरा, एक और निर्भरता?
यह पुस्तक संसार को छोड़ने की बात नहीं करती; यह संसार से सही संबंध बनाने का आमंत्रण है। हल्कापन कहीं बाहर से लाई जाने वाली वस्तु नहीं; वह खुद-ब-खुद आता है, जब मन देख पाता है कि वह किन-किन सहारों के नाम पर स्वयं को दबाए हुए है।
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे हम समाज, संयोग और परिवार से मिले हुए मान्यताओं/परंपराओं को ही कर्तव्य मानकर जीते रहते हैं।
कबीर साहब के भजन 'भूले मन समुझ के लाद लदनिया' के व्याख्यान पर यह पुस्तक हमें अपने मन, मान्यताओं और जीवन की दिशा पर गंभीरता से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करती है।
Avinashi Parashar
3mo
थोड़ा लाद..अधिक मत लादे..टूट जाये तेरी गर्दनिया..!.