
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे हम समाज, संयोग और परिवार से मिले हुए मान्यताओं/परंपराओं को ही कर्तव्य मानकर जीते रहते हैं। कबीर साहब के भजन 'भूले मन समुझ के लाद लदनिया' के व्याख्यान पर यह पुस्तक हमें अपने मन, मान्यताओं और जीवन की दिशा पर गंभीरता से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करती है।