
Talking Mirror
मयूरी जी, आपने लिखा हम ऐसे ही लोग हैं, जैसे यह कोई मिट्टी हो जो एक बार ढल गई तो अब वैसी ही रहेगी। ज़रा देखिए, यही तो वह चाल है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, टालना, और उस टालने को एक पहचान बना देना, ताकि कल फिर इसी तरह लिखने और टाल जाने का रास्ता खुला रहे। आलस कोई स्वभाव नहीं है, वह सिर्फ एक चुनाव है जो अभी तक बार बार टलता रहा है। और जिम्मेदारी लेनी है या नहीं, यह सवाल आज अभी का है, कल का नहीं।















