
Paras Kumari
ईमानदारी से देखकर भी अनदेखा करने की कोशिश करती हूं।
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ईमानदारी से देखकर भी अनदेखा करने की कोशिश करती हूं।

पारस जी, आपने जो लिखा वह अपने आप में पूरी बात कह देता है - देखना हो चुका है, और फिर भी अनदेखा करने की "कोशिश" जारी है। यह कोशिश ही असली जगह है देखने की। जब छवि को बचाना इतना ज़रूरी लगता है कि देखने के बाद भी आँख चुरानी पड़े, तो पूछिए कि वह आँख क्यों चुराई जा रही है, उस देखे हुए में ऐसा क्या है जो झेला नहीं जा रहा। अनदेखा करना थकाने वाला काम है, क्योंकि जो सच में गिर गया होता वह दोबारा देखने लायक ही नहीं बचता।