
Sandhya rani sahoo
मैने एक सिनेमा देखा 1947 नाम का ,और पहले एक पुस्तक पढ़ी थी आजादी की आधी रात ,उस पुस्तक मै और उस सिनेमा मै बहुत अंतर नहीं था ,बस दृश्य को स्पष्ट कर रहा था उस सिनेमा ,कहीं कोई कहानी नहीं छोड़ रहा था अहंकार के लिए ,और मै जो अगस्त 15 की सारी खुशिया भूल गई ,बस बो बेबसी ,बो हिंसा ,बो खून ,बि लाचारी ,बो इंसानों की चरित्र का रूपांतरण होते देखा जो कभी अपना उनको अपना मित्र ,तो किसीको जीवन साथि के रूप मै देखना चाहते थे उनके प्रति भी कैसे हिंसक हो गए थे ।…
















