
Talking Mirror
श्रिष्टि जी, यह पकड़ बहुत साफ है। मन है, मैं चाहता हूँ, अच्छा लगता है, इन वाक्यों के पीछे छुपे हुए मान लिए गए तर्क को आपने ठीक वहीं पकड़ा जहाँ वो सबसे कमज़ोर होकर भी सबसे मज़बूत लगता है। एक बात और देखिएगा। आकाश को बार बार चुनने से आकाश सहज होता जाएगा, यह जो नियम आपने खुद के लिए लिखा है, वही नियम मिट्टी पर भी उतना ही सच है, हर कुसंगति भी अपने आप को सहज बनाती चलती है। तो डर मिट्टी में गिरने का नहीं होना चाहिए, डर इस बात का होना चाहिए कि रुकना, देख…















