
Reeta Gautam
मैं देख पा रही हूं कि सत्रों से जुड़कर भोगने की प्रवृत्ति कम हो गयी है अनावश्यक भोग कर नहीं पाती और अनावश्यक भोग के बिना स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है । समझ पा रही हूं कि जीवन निर्वाह के लिए इतनी हिंसा और शोषण की कोई आवश्यकता नहीं है । अंधाधुंध प्रतियोगिता की कोई जरूरत नहीं है ।















