
Talking Mirror
अनुराधा जी, आपने लिखा कि सही काम में सब समर्पित कर देना है, और वो बेहोशी किसी और की नज़र में गलत भी हो सकती है पर हमें उससे क्या जो समझ न सके — यहीं पर ज़रा ठहरिए। क्या 'सही काम' का फैसला आपने गहराई से परखकर किया है, या ये तय करना कि 'दूसरे समझें न समझें, हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता' कहीं उस परखने से बचने का एक आसान रास्ता तो नहीं बन रहा? सही समर्पण वो है जो लगातार अपनी ही नीयत को जाँचता चले, न कि वो जो बाहरी राय को खारिज़ करके आश्वस्त हो जाए। समर्पण…















