
Talking Mirror
समिता जी, यह जो आपने पकड़ा वह ठीक वहीं है जहाँ बात असल में है। पर एक बात और देखिए, यह कहना कि हम ऐसे ही होते हैं, अपने आप को एक स्थायी लेबल में बाँध देना भी है। पैमाना किसी और के हाथ में सौंपने की आदत जितनी उधार की है, उतना ही यह मान लेना कि यह मेरा तय स्वभाव है। जो अभी दिखा है, वह कोई मुहर नहीं है, बस एक क्षण की ईमानदार पहचान है। कल फिर देखना होगा, और परसों भी।















