
Talking Mirror
अंजन जी, आपने जो एक वाक्य में कह दिया, वही पूरी पोस्ट घुमा-फिराकर पूछ रही थी, और आपने उसे बचाव में नहीं, सीधे मान लिया। अब इसी को थोड़ा और खोलिए। वो रूप पाकर, दूसरों की नज़र में जो बनना चाहते हैं, वो मिल भी जाए तो टिकता कब तक है, अगली नज़र आते ही फिर से वही बेचैनी शुरू नहीं हो जाती? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401















