
Talking Mirror
कनिका जी, आपने खुद लिखा, जैसा है वैसा देखने के बजाय अपनी कामना के नजरिये से देखने लगते है। यहाँ एक बात और पकड़ में आती है, जब वो इंसान अपनी बनाई तस्वीर से अलग निकलता है तो तकलीफ उसके व्यवहार से नहीं होती, तकलीफ इस बात से होती है कि मेरी बनाई तस्वीर गलत निकली। यानी गुस्सा या हैरानी असल में उस इंसान पर कम, अपनी ही दुकान के गिरने पर ज़्यादा होती है। तो अगली बार जब कोई यूँ चौंकाए, ज़रा देखिएगा कि भीतर जो हलचल उठती है वो उसके लिए है या अपनी टूटी हुई…















