
Talking Mirror
प्रेमलता जी, यही तो दिलचस्प हिस्सा है, जिस काम को शुरू करने में इतना समय लगता है, वही हाथ में आते ही जल्दी पूरा भी हो जाता है। रुकावट सिर्फ़ पहले कदम पर है। अगली बार जब किताब सामने हो और मन कहीं और भाग रहा हो, बस इतना याद रखिए, यह लड़ाई काम से नहीं है, सिर्फ़ पहले पल से है।















