शीतल जी, ये लाइन बोलने में जितनी आसान लगती है, मानने में उतनी ही मुश्किल है। ईमानदार कबूलनामा अक्सर वहीं रुक जाता है जहाँ उसे रुकना नहीं चाहिए, सिर्फ नाम रख देने में। किस कर्मकांड या डर को आपने अपनी ज़िंदगी में अभी पहचाना, जिसे भय ने नहीं बल्कि सिर्फ आदत ने चलाया है?