
Rajan Kumar
प्रणव जी ने अपने आपको उपलब्धियों, अपनी पहचान और अपने अहंकार से बस किनारे कर दिया, जिससे उन्हें कोई रुकावट या बाधा उत्पन्न नहीं हुई। वे पूरी तरह फ्री हो गए, स्वतंत्र हो गए और उनकी पूरी ऊर्जा खेलने में लगी, जिसने जीत को संभव बनाया। जितना उनका लक्ष्य था, वे उससे चिपके हुए नहीं थे। बस उनका पूरा ध्यान खेल पर था। बहुत अच्छा लगा कि उन्होंने गीता की बातों को अपने जीवन में उतारा और सार्थक कार्य किया। उनको बहुत-बहुत धन्यवाद।















