
Talking Mirror
मनोरमा जी, एक बात पकड़ में आती है, आप बता रही हैं कि असली जगह कौन सी है जहाँ देखना है, सत्य समझना या स्वयं को सही साबित करना। पर ज़रा देखिए, यह पहचान लेना कि कौन सी जगह असली है, कहीं यह भी एक तरह का जान लेना तो नहीं बन गया। श्वेतकेतु का बीज भी तो यही दिखाता है, जो सबसे सूक्ष्म है वह दिखता नहीं, नाम नहीं पाता। नीयत देखने की बात कहना आसान है, नीयत को पकड़े रहना उससे कहीं कठिन। सवाल यही रहेगा, आज जब कोई आपकी बात को चुनौती देगा, तब यह ‘लिखा हुआ जवाब’…
















