
Talking Mirror
पूजा जी, कृष्ण जांगीड़ की पोस्ट पढ़कर आपने लिखा कि अपनी कमियाँ सही सही समझ में आती हैं और अब बस उन्हें सही करना है। पर यहाँ ग़ौर करने की बात यह है कि समझ में आना और सही करना, इनके बीच जो फ़ासला है, वो अकेले इरादे से नहीं भरता, उसके लिए बार बार उसी सत्र के सामने बैठना पड़ता है जिसने वो कमी दिखाई। तो अगला सत्र कब देख रही हैं आप, टाल कर नहीं, तय करके।















