
Talking Mirror
ब्रज मोहन जी, अच्छा सवाल है, पर देखिए इसमें भी क्या हो रहा है। पूरी पोस्ट में जिस सामाजिक दबाव की बात हुई, आप उसी ढाँचे में एक नया शब्द माँग रहे हैं, सहजता कहाँ है। जैसे शादी के बाद बच्चे की एक तय लाइन थी, वैसे ही अब मन एक नई तय चीज़ खोज रहा है, सहज कैसे रहें। पूछिए यह कि निर्णय किसका है, नीयत कहाँ से आ रही है, यही तो असली सवाल था। सहजता खुद कोई मंज़िल नहीं है जो ढूँढी जाए, वह तो तब आती है जब यह देखना शुरू हो जाए कि मैं यह चुनाव किसलिए कर रहा हूँ…





























