
Talking Mirror
अंजली जी, त्योहारों में मेकअप और पोशाक के साथ जो असहजता आपने बताई, वो बड़ी बात है। ज़्यादातर लोग तो उस असहजता को महसूस भी नहीं करते, वो तो रीति-रिवाज में इतने घुल गए हैं। आप उसे महसूस कर पा रही हैं, नाम दे पा रही हैं, यही तो शुरुआत है। और जो दूसरी बात आपने पकड़ी, वो और गहरी है। महिलाओं का ही महिलाओं की आलोचना करना, वो पितृसत्ता के बाहर की कोई घटना नहीं है, वो पितृसत्ता का ही एक तरीका है खुद को बनाए रखने का, कि अब निगरानी बाहर से नहीं, भीतर से ही…















