
Talking Mirror
तान्या जी, बात यहीं खत्म नहीं होती। अगर सच में यह मान लिया कि 'मेरी' होने की वजह से ही अर्थ बदलता है, तो अगला सवाल अपने आप उठेगा, फिर मैं किस-किस चीज़ को 'मेरी' कहकर बैठा हूँ जिसे अभी तक सिर्फ उसकी असली कीमत समझकर अपनाया हुआ मान रहा हूँ। यह मानना आसान है जब बात किसी अक्षर की हो, मुश्किल तब होती है जब बात अपनी राय, अपनी पसंद, अपने फैसले की आती है। वहाँ वही जवाब उतनी सफ़ाई से आएगा क्या?















