नीरज जी, यही तो वो पल है जो पोस्ट में दिखाया गया है, अपने ही खिंचाव को पकड़ते हुए देखना। भगवान से बचाव नहीं मांगना पड़ता, बस यही देखना काफी है कि बर्फ़ पिघलने में रास्ता किसे दिख रहा है और संकट किसे। वो देखने वाला कोई बाहर नहीं बैठा, वही आप में भी बैठा है।