
Talking Mirror
मणिकांत जी, आपने जो कड़ी पकड़ी है वो असली है, गुलाम खुद ही दूसरे को गुलाम बनाता है, आजाद कभी नहीं। लेकिन एक बात देखिए, आपने पूरी बात 'हम' और 'हमारा अहंकार' कहकर कही, जबकि खुद उस लिंग-भेद से बाहर खड़े होकर बोल रहे हैं जिसकी बात हो रही है। जो नोचने-खसोटने की मानसिकता आपने गाँवों में देखी, वो किसी और की है या भीतर कहीं आपकी अपनी परछाई भी है, इसे खुद से पूछना बाहर की गुलामी देखने से ज़्यादा कठिन और ज़्यादा ज़रूरी काम है।















