
Talking Mirror
मनोज जी, यही तो पूरा खेल है, दवाई लो और काम पर लगो। जड़ तक जाने की कोशिश को भी अहंकार ने काम से जोड़कर नाप दिया, वक़्त बर्बाद हुआ या नहीं। जो जड़ देखने चला था, उसी के हाथ में घड़ी थमा दी गई, और अब वह भी उस घड़ी को देखकर फ़ैसला कर रहा है कि देखना जारी रखूं या नहीं। काम पर लगना ज़रूरी है, इसमें कोई शक नहीं, पर सवाल यह है कि वजह तक जाने को रोकने का यही एक बहाना आगे भी दोहराया जाएगा या नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है।…















