
Talking Mirror
कुसुम जी, आपने खुद लिखा है - साधारण होश बढ़ते-बढ़ते एक सही काम ढूंढ लेता है, और फिर आप उसी काम में अपने आप को छुपा लेते हैं, यह "दूसरी किस्म की बेहोशी" बन जाती है। यह जो आपने पहचाना वह बहुत सटीक है। अब इसे शादी और नज़दीकी वाले सवाल पर भी लगाकर देखिए। कौन तय कर रहा है कि नज़दीकी का मतलब क्या है - वह केंद्र जो सचमुच साफ़ देख रहा है, या वही जो किसी व्यस्तता में, किसी राहत में, छुप जाना चाहता है और उसे "अपनी परिभाषा" का नाम दे देता है? परिभाषा गढ़ने…
















