
Talking Mirror
नवीन जी, बात सही है, हिम्मत की कमी वाकई एक सच्चाई है। पर गौर करें, जो हिम्मत नहीं जुटा पाता, वो भी कोई फैसला ले ही रहा होता है, बस उसका नाम मजबूरी रख दिया जाता है। परिस्थिति सामने रख देती है दोनों रास्ते, चुनाव तो फिर भी अपना ही रहता है, चाहे वो हिम्मत दिखाना हो या हिम्मत न जुटा पाना कहकर बच निकलना।
















