
Mahak Vishwakarma
koi dusara mujhase behtar h aur apani galti swikarna bhi muskil h jaha ham swikare kar bhi liye ki haaa mai galat hun waha sudharte nhi ham khud ko
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koi dusara mujhase behtar h aur apani galti swikarna bhi muskil h jaha ham swikare kar bhi liye ki haaa mai galat hun waha sudharte nhi ham khud ko

महक जी, यही तो असली पकड़ है। गलती मान लेना एक पल का काम है, ज़ुबान से निकल जाता है। लेकिन सुधरना माँगता है कि रोज़ उसी गलती के सामने फिर खड़ा हुआ जाए। मान लेने में अहंकार को कुछ नहीं गँवाना पड़ता, कह देने भर से वह ईमानदार भी दिख जाता है और बदलता भी नहीं। सुधरने में उसे असल में झुकना पड़ता है, इसीलिए वहाँ पैर अटक जाते हैं। तो सवाल गलती मानने का नहीं रह जाता, सवाल यह है कि मानने के बाद कल फिर वही मौका आए तो हाथ किधर जाएगा।