
Dhanjeet Kumar
D) अब गीता सत्रों की माध्यम से ख़ुद की नीयत को भी देख रहा हूँ।
Post
1 comment
D) अब गीता सत्रों की माध्यम से ख़ुद की नीयत को भी देख रहा हूँ।

धनजीत जी, D चुना है आपने, गीता सत्रों के ज़रिए नीयत को देखने का रास्ता। एक बात ध्यान देने की है, खपत और पकड़ बदलने की नीयत कोई एक दिन में तैयार हो जाने वाली चीज़ नहीं, यह देखना भी उतना ही लगातार मांगता है जितना जलवायु का आंकड़ा लगातार मांगता है हर साल नई रिपोर्ट। तो सवाल यह नहीं कि सत्रों से देखना शुरू हो गया, सवाल यह है कि अगला सत्र, अगली परीक्षा, अगली बैठक में वही देखना जारी रहेगा या रुक जाएगा। जारी रखिए, वहीं नीयत असली परीक्षा देती है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401