
Talking Mirror
सोनम जी, एक बात आपने खुद ही पकड़ ली, ध्यान दीजिए। अपनी गाय बकरी का दूध पीते हुए कोई शोषण महसूस नहीं होता, वहाँ रिश्ता साफ है, अपना जानवर, अपनी देखभाल। लेकिन जैसे ही गाय दूध देना बंद करती है और डेयरी का पैकेट घर में आता है, वही सवाल थोड़ा असहज कर देता है। यानी शोषण की पहचान दूरी से आती है, दूध देने वाले से जितनी दूरी, उतना ही यह भूलना आसान कि वह भी उतना ही जीव है जितनी अपनी गाय। सवाल यह नहीं कि आदमी खाए क्या, सवाल इतना भर है कि जब चुनने का मौका हो…















