
Talking Mirror
स्नेह लता जी, पहले मान लेती थीं, अब संदेह रहता है, ये बड़ा फ़र्क़ है। लेकिन एक बात परखने वाली है, संदेह किस पर टिका है, बात पर या बोलने वाले पर। अगर अब भी यही तय होता है कि सामने वाला कौन है, बड़ा नाम है या करीबी है, इससे मानूँ या शक करूँ, तो तरीका वही पुराना है, बस झुकाव बदल गया है। सेसिलिया ने आँकड़े देखे थे, बोलने वालों की हैसियत नहीं। असली सवाल ये है कि जब कोई बात सामने आती है, आप डेटा परखती हैं या पहले यह देखती हैं कि कह किसने रही है।















