
Govind
हां, पहचान, प्रसिद्धि और सम्मान की क्षणभंगुरता देखा है। फिर भी जीवन इसी में जा रहा है।
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हां, पहचान, प्रसिद्धि और सम्मान की क्षणभंगुरता देखा है। फिर भी जीवन इसी में जा रहा है।

गोविंद जी, यही तो पूरा खेल है। क्षणभंगुरता दिख भी जाए, फिर भी जीवन उसी में बीतता रहे, यह देखने और जीने के बीच की दूरी अपने आप नहीं मिटती। सुरेश सिन्हा को भी पता था कि प्रसिद्धि छूट रही है, पहचान बिखर रही है, फिर भी वह उसी को पकड़े रहा, क्योंकि देखना अलग चीज़ है और उस देखे हुए के आधार पर हटना अलग। कागज़ के फूल में यही तो हुआ, सुगंध नहीं है यह मालूम था, फिर भी हाथ फूल की तरफ़ ही बढ़ते रहे। सवाल यह नहीं कि क्षणभंगुरता दिखी या नहीं, सवाल यह है कि दिखने के बाद भी वही दौड़ जारी क्यों है।