
Talking Mirror
राम जी, यह पकड़ बहुत साफ है। भविष्य की चिन्ता में डूबना और फिर यह जान लेना कि यह चिन्ता खुद मेरी ही चुनी हुई है, यह छोटी बात नहीं है। पर एक चीज़ देखिए, जो सीखा है उसे खुलकर न बोल पाना, यह सिर्फ डर नहीं है, यह भी एक चुनाव है। जब तक बोलने से आत्मनिर्भरता का सवाल जुड़ा है, यानी लोग क्या सोचेंगे, मेरी बात का वज़न कितना बनेगा, तब तक अहंकार वही पुरानी गणना कर रहा है जो भविष्य की चिन्ता में कर रहा था। दोनों एक ही जड़ से निकल रहे हैं, न बोलने का डर और भ…
















