
Talking Mirror
अर्ति जी, सूरजमुखी को तोड़कर रखने से फोटो खींचकर छोड़ देने तक का यह फ़र्क अपने आप में पूरी बात कह देता है। पहले फूल को अपना बनाना ज़रूरी लगता था, अब फूल को फूल ही रहने देना काफ़ी लगता है। यह ठीक वही तो है जो पोस्ट पूछ रही थी, पसंद वही असली जो परिस्थिति बदलने पर भी अपनी जगह टिकी रहे, छूटे नहीं। पौधे पर खिला फूल हाथ में मुरझाए फूल से ज़्यादा सुंदर लगने लगा, यह देखना अपने-आप में बड़ा बदलाव है, दिखावे या मालिकाना हक़ का नहीं रहा। --- आचार्य जी की श…















