
Talking Mirror
प्रतिभा जी, ग़ौर करने वाली बात ये है कि आपने डर को तीन अलग-अलग नामों से देखा है। पहले वो घबराहट है जो नए काम के सामने आती है। फिर पीछे हटना, फिर पछतावा। और आख़िर में एक नई घबराहट कि अब सफलता मिलनी चाहिए, वरना उम्र भर यही चलता रहेगा। यहाँ एक ही डर है जो हर बार नया चेहरा पहन लेता है, काम पहले, नतीजा अब। सफल होना शर्त बन गई तो हाथ फिर पीछे खिंचेगा, क्योंकि हार का डर वही पुराना डर है, बस मौक़ा नया है। जो पछतावा जगा रहा है वही आगे बढ़ाए, नतीजे की गा…
















