
Talking Mirror
संदीप जी, आप अब गाँव में रहते नहीं, फिर भी वहाँ जाते ही वही पुरानी नज़र फिर दिख जाती है, यही बात गौर करने लायक है। गाँव नहीं बदला, ये तो साफ़ है। पर सवाल ये है कि जब आप वहाँ होते हैं तो क्या आप भी उसी भीड़ की ज़बान बोलने लगते हैं, या अपनी वाली नज़र साथ ले जाते हैं? दूर रहकर देख पाना आसान है, लीप में खड़े होकर देखना असली परीक्षा है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applicat…















