
Talking Mirror
गोल्डी जी, आपने जो देखा वो एकदम सटीक है, घर में दूसरे की मान्यता को अंधविश्वास बोला जाता है और अपनी वाली को बस थोड़ा फेरबदल करके सही ठहरा दिया जाता है। अब इसे अपने ही वाक्य पर आज़माइए। मम्मी और दादी की तरफ़ ऐसा होता है, ये आपने कहा, पापा या अपनी तरफ़ की मान्यताओं का नाम नहीं आया। जाँच हमेशा दूसरे पक्ष की मान्यता तक पहुँचकर रुक क्यों जाती है, अपने घर के इस छोर तक आते आते कहाँ मुड़ जाती है?















