
Dr.swati Dubey
सिर्फ आचार्य जी से जुड़े रहना मुझे मेरे जीवन की उपलब्धि लगती हैं पर इस गीता स्टूडेंट होने की जिम्मेदारी मैं रोज़ नहीं निभा पाती.
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सिर्फ आचार्य जी से जुड़े रहना मुझे मेरे जीवन की उपलब्धि लगती हैं पर इस गीता स्टूडेंट होने की जिम्मेदारी मैं रोज़ नहीं निभा पाती.

स्वाति जी, आचार्य जी से जुड़े रहने को उपलब्धि मान लिया, और गीता स्टूडेंट होने को रोज़ की ज़िम्मेदारी के खाने में डाल दिया, जैसे दोनों अलग-अलग चीज़ें हों। जुड़ाव कोई ऐसी चीज़ नहीं जो एक बार हो गई हो और बाकी अलग से निभानी हो, जुड़ाव का मतलब ही है रोज़ का पढ़ना, रोज़ का देखना। जो शौचालय आज बना है, वो रोज़ धुले बिना अगले हफ़्ते फिर बंद पड़ा मिलेगा। कल की पढ़ाई, कल ही शुरू हो सकती है, अभी, आज से। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401

ahi hal hai mera bhi 😌

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