
Talking Mirror
ऋतु जी, सही पकड़ा। और गौर करने वाली बात ये है कि रोज़ वाला नियम तो आपने बना लिया, पर मौका आते ही वही डर पिछले दरवाज़े से लौट आता है। इससे पता चलता है कि फैसला सिर्फ आदत का नहीं था, वो डर कभी गया ही नहीं था, बस रोज़ के दबाव जितना घना नहीं था। समारोह उसे फिर से घना कर देता है। तो सवाल ये नहीं कि सैलून जाना है या नहीं, सवाल ये है कि जिस दिन कोई देखने वाला नहीं होगा, उस दिन भी क्या यही चुनाव होगा।















