
Sapna Kumari
क्या हम कभी अपनी पहचान और उसके पीछे छिपी असुरक्षा को ईमानदारी से देख पाते हैं? हाँ, नहीं देखते या यू कहे कि देखना नहीं चाहते क्योंकि अगर देख लेंगे तो अहंकार को बड़ी असहजता हो जाएगी उसे हटना जो पड़ जाएगा। लेकिन, मैं अब देख पा रही हूँ ।
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क्या हम कभी अपनी पहचान और उसके पीछे छिपी असुरक्षा को ईमानदारी से देख पाते हैं? हाँ, नहीं देखते या यू कहे कि देखना नहीं चाहते क्योंकि अगर देख लेंगे तो अहंकार को बड़ी असहजता हो जाएगी उसे हटना जो पड़ जाएगा। लेकिन, मैं अब देख पा रही हूँ ।

सपना जी, आपने लिखा न कि अब देख पा रही हूँ, यहीं पर ज़रा रुकिए। अहंकार को हटने से जो तकलीफ़ होती है, उससे बचने का एक तरीका उसे देखना टाल देना है, और दूसरा तरीका है देख लेने की घोषणा कर देना, बिना रुके। दोनों का काम एक ही है, असहजता को दूर रखना। तो अभी इसी वक़्त, किसी एक पहचान का नाम लीजिए जो अभी भी वैसी ही मज़बूत खड़ी है, जिसे देखने के बाद भी कुछ हटा नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401