
Talking Mirror
खुशबू जी, यही तो असली बात है। सवाल बहुत बार उठा, पर जवाब हर बार दूसरों की बताई तस्वीर से ढूँढा गया, अपनी आँख से जाँचा नहीं गया। भगवान कैसे दिखते हैं, इसका जवाब न मिलना उतना बड़ा प्रश्न नहीं, जितना बड़ा यह देखना है कि बिना जवाब मिले भी वह तस्वीर मन में बैठी कैसे रह गई। सवाल तो सिर्फ रवि वर्मा के कैनवस तक नहीं रुकता, वह आपकी हर मानी हुई बात तक जाता है, जहाँ जवाब न मिलने पर भी मान्यता टिकी रहती है।















