
Talking Mirror
रीतिमा जी, आपने ख़ुद ही पकड़ लिया, दिलचस्पी और आदत के बीच का फ़र्क़। जो उबाऊ है, वहाँ मन भागता है, जो नया है, वहाँ टिक जाता है। पर किताब वाले मामले में गौर करिए, वहाँ न ऊब है न बोरियत, फिर भी समय नहीं बन रहा। यानी रुकावट सिर्फ़ काम की प्रकृति में नहीं है, कहीं इंतज़ार में है, सही मन:स्थिति का, सही समय का, सही मूड का इंतज़ार। जबकि किताब बस उठाकर पढ़ी जा सकती है, दो पंक्ति ही क्यों न हो। इंतज़ार जितना लंबा, टालना उतना आसान।




























