
हमारे भीतर बैठा हुआ 'मैं' अक्सर समाज और परिवार में होने वाली गलतियों को देखकर डर जाता था, या यों कहें कि मैं चुपचाप उन स्थितियों को केवल देखता रहता था और चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता था। पहले शायद भीतर वह सोचने और समझने की गहरी शक्ति या वैचारिक स्पष्टता नहीं थी। परंतु अब सही और गलत को परखने का जो दृष्टिकोण मंच के माध्यम से मिल रहा है, उससे मेरे भीतर एक नया साहस और स्पष्टता जागृत हुई है।
















